Posts

Showing posts from 2018

लीलाधर’ भगवान श्रीकृष्ण

Image
‘ लीलाधर’ भगवान श्रीकृष्ण             श्रीकृष्ण को कुछ लोग भगवान, तो कुछ लोग महामानव के रूप में स्वीकार करते हैं। सनातन धर्म  को मानने वालों ने श्रीकृष्ण को भगवान के रूप में अपनाया है तो अन्य लोगों ने उन्हें महामानव की संज्ञा दी है। श्रीकृष्ण ने हमें मानवीय मूल्यों से परिचित कराने के लिए एक ऐसा ग्रंथ दिया, जो वास्तव में अद्वितीय है। श्रीमद्भभगवतगीता को मानवतावादी पुस्तक का दर्जा प्राप्त है, क्योंकि इस देववाणी में मानव के मस्तिष्क में आने वाले हर एक प्रश्न  का उत्तर मिल जाता है।            व्यक्ति उपदेशों से नहीं अपितु अपने कर्मों से महान बनता है। यदि हम श्रीकृष्ण को एक मानव के रूप में देखें तो उनमें ईश्वरीय गुण अवश्य देखने को मिल जाएगें। श्रीकृष्ण को परिभाषित करने या फिर उन्हें जगत के अन्य मनुष्यों से सर्वश्रेष्ठ दर्शाने वाले गुण- महायोगी- श्रीकृष्ण महायोगी थे। महायोगी का अर्थ उस व्यक्ति से होता है, जिसने काम को जीता हो। लोगों को संदेह रहता है कि हजारों पत्नियों के रहते वे महायोगी कैसे हो सकते हैं? ‘ काम,...

राम एक आदर्श के रूप में...

Image
  राम एक आदर्श के रूप में... हम सभी राम को भगवान के रूप में स्वीकार करते हैं। एक भगवान का मर्यादा में रहना कोई बड़ी बात नहीं होती है, परन्तु राम एक मनुष्य के रूप में इस पृथ्वी पर आए और सदैव ही एक मनुष्य की तरह ही सुख-दुख का निर्वहन किया। राम ने कभी स्वयं को भगवान नहीं कहा और कोई भी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जिससे हम उन्हें भगवान के रूप में स्थापित करें। राम का जीवन आदर्श जीवन था और इसी आदर्श के कारण उन्हें भगवान का दर्जा दिया गया। वैसे भी हमारे देश की बात ही निराली है, हम किसी अच्छे व्यक्ति की नहीं मानते बल्कि उस व्यक्ति को मानने लगते हैं। राम ने अपने संपूर्ण जीवन में एक नहीं हजारों मर्याएं प्रस्तुत की जो उन्हें भगवान की श्रेणी तक ले जाती हैं। आदर्श भाई- राम जैसा भाई शायद ही कोई और देखने को मिले। अपने छोटे भाईयों के प्रति प्रेम के कारण ही उनके सभी भाई अपने माता-पिता के समान ही राम का सम्मान करते थे।   भरत के लिए राज सुखों का त्याग हो या लक्ष्मण को शक्ति लगने पर उनकी व्याकुलता और सबसे छोटे भाई शत्रुध्न के प्रति अपार प्रेम और विश्वास की संसार का सबसे घातक अस्त्र भ...

दुर्योधन वध

Image
                              दुर्योधन वध दुर्योधन का अन्त अभिमान और स्वार्थ का अंत था। व्यक्ति सबकुछ पाने की चाह में किस हद तक गिरकर अपने ही परिवार को छलने लगता है और महत्वाकांक्षा की वेदी पर अपनी और अपनों की भी बली चढ़ा देता है, यह सीख दुर्योधन के जीवन से लेनी चाहिए।                  व्यास जी के आशीर्वाद से गांधारी को एक सौ पुत्रों की प्राप्ति हुई। बड़े पुत्र का नाम सुयोधन रखा गया। सुयोधन वीर योद्धा था परन्तु गुणों की तुलना में दुर्गुण असंख्य थे। इन दुर्गुणों का बीजारोपण वास्तव में उसके पिता ने किया था। धृतराष्ट कि कुंठा और अंधी महत्वाकांक्षा ने सुयोधन के दुर्योधन होने तक की यात्रा में अपना पूर्ण योगदान दिया। बाल्यावस्था में ही दुर्योधन की कुटिलता दिखने लगी थी, जिसके कारण वह अपने ही भाई भीमसेन को जहर खिला देता है।  अपने अवगुणों को न देखकर अपनों की ख्याति से जलना तो दुर्योधन ने अपने ही पिता से सीखा था। पिता भी पुत्र मोह में इतना अंधा हो चुका था कि ...

बर्बरीक: चतुर्थ भाग

Image
बर्बरीक: चतुर्थ भाग  ( शीश दानी बर्बरीक )           महाभारत के युद्ध के आरम्भ के ठीक पहले बर्बरीक का जन्म हो चुका था। अपनी माता के सानिध्य में बड़ रहा बर्बरीक श्रीकृष्ण का अनन्य भक्त बन गया था। एक दिन बालक बर्बरीक ने अपनी माता से प्रश्न किया कि मोक्ष प्राप्ति कैसे होती है ? अहिलावती ने बर्बरीक को बताया कि मोक्ष प्रप्ति के लिए भगवान की अनन्य भक्ति करनी होती है। बर्बरीक ने कहा कि कोई और रास्ता नहीं है, जिससे मोक्ष की प्राप्ति सहजता से की जा सके। अहिलावती ने कहा कि यदि किसी का वध भगवान के हाथों से हो जाता है, तो वह मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। ये बात बालक बर्बरीक के दिल में घर कर गयी।           पिता घटोत्कच और माता अहिलावती की तरह ही वह भी कई मायाबी शक्तियों का स्वामी बन गया था। बर्बरीक को कामाख्या देवी नें तीन तीर प्रदान किए थे, जिनसे वह पूरे संसार को नष्ट करने का सामर्थ रखता था।            बालक बर्बरीक समय के साथ बड़ा होता जा रह...

बर्बरीक: (भाग तृतीय)

Image
      बर्बरीक: (भाग तृतीय)       घटोत्कच की मृत्यु पर प्रसंन हुए श्रीकृष्ण                          घटोत्कच एक वीर योद्धा था, साथ वह आपनी माता की तरह श्रीकृष्ण का परम भक्त भी था। जब श्रीकृष्ण ने प्रागज्योतिषपुर के राजा भौमासुर और उनके सेनापति मुरार का वध किया तो मुरार की पुत्री का विवाह घटोत्कच के साथ करा दिया। क्योंकि श्रीकृष्ण यह भलीभांति जानते थे कि इन दोनो की प्रवृत्तियां एक समान ही हैं। घटोत्कच का जन्म मनुष्य और राक्षस प्रजाति के मिलने से हुआ था, और अहिलावती को कामाख्या देवी की सिद्धी प्राप्त थी। इस तरह दोनों ही अपार शक्तियों से पूर्ण थे। श्रीकृष्ण ने अहिलावती को प्रतापी पुत्र प्राप्ति का वरदान भी दिया था। जिसके कारण यह विवाह आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य़ भी था।                  महाभारत के युद्ध के समय भीष्म के बाद कर्ण को सेनापति बनाया जाता है। कर्ण के मन में अर्जुन के प्रति पहले से नफरत थी, कर्ण के जीवन का एकमात्र उद्देश्य ...

बर्बरीक: (दूसरा भाग) भीमसेन और हिडिम्बा का विवाह

Image
                भीमसेन और हिडिम्बा का विवाह            लाक्षागृह की घटना के बाद सभी पांडव माता कुन्ती के साथ कुछ समय के लिए अज्ञात जीवन व्यतीत कर रहे थे। एक दिन सभी पांडव और कुंती भ्रमण करते हुए एक वन में आ पहुंचे। रात्रि का समय आने पर सभी लोग उसी वन में सोने लगे। उस वन में एक हिडिम्ब नाम का राक्षस रहता था। उस राक्षस की एक बहन भी थी, जिसका नाम हिडिम्बा था। हिडिम्बा ने वन में आते समय सभी को देखा था। उसका मन भीमसेन के प्रति आकर्षित था, वह मन ही मन भीम को प्रेम भी करने लगी थी। लेकिन हिडिम्ब ने सभी पांडवों को कुंती के साथ ही खा जाने की योजना बनाई, क्योंकि हिडिम्ब नरभक्षी राक्षस था। यह बात हिडिम्बा ने अपने भाई से छुपकर भीमसेन को बता दी। जैसे ही हिडिम्ब ने रात्रि के समय सभी पर हमला बोला भीम ने उसे मार गिराया। साथ ही   हिडिम्बा के साथ विवाह भी कर लिया।         मां कुंती ने हिडिम्बा को आदेश दिया कि तुम हमारे साथ तभी तक रह सकती हो जबतक तुम्हें कोई संतान न ह...

बर्बरीक: प्रथम भाग

Image
                           बर्बरीक               महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। कुछ समय तक पांडवों के मन में यह ग्लानि रही कि उन्होंने अपने ही परिवार के सदस्यों को युद्ध में मार दिया है। पर समय का पहिया इस वेग से चला कि कुछ ही समय में सभी पांडव इस बात को भूल गए।                एक दिन सभी पांडव और भगवान श्रीकृष्ण आपस में वार्तालाप कर रहे थे। तभी भीमसेन ने कहा कि मैंने अकेले ही सभी कौरवों का सर्वनास कर दिया। भीमसेन की बात सुनकर अन्य सभी पाण्डव भी युद्ध में अपने द्वारा मारे गए महारथियों के नाम लेने लगे। श्रीकृष्ण शान्त चित्त होकर सबकी बातें सुन रहे थे। सभी पांडवों की बातों से अभिमान झलक रहा था। कोई भी अपने को कम नहीं बता रहा था औऱ यह बताने का प्रयास कर रहा था कि उसी की वजह से पूरा युद्ध जीता गया है। तभी एक हंसी की आवाज सुनाई दी जो बहुत ही कर्कस थी। साथ ही इन सभी बातों को सुनकर भगव...

सृष्टि का आरम्भ

Image
                                    सृष्टि का आरम्भ                       जगत नासवान है पर कुछ तत्व कभी नष्ट नहीं होते वे हैं , शक्ति और साध्य। शक्ति और साध्य के मिलने से ही सृष्टि का सृजन होता है।                    जब पूरा ब्रह्माण्ड जल मग्न था तब उस जल में शक्ति विचरण कर रही थी। इस शक्ति का कोई स्वरूप नहीं था और न ही कोई लिंग। अनन्त काल के भ्रमण के बाद उस शक्ति को स्थाईत्व की आवश्यकता हुई , जिससे सृजन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके। उस शक्ति ने स्वयं को एक स्थान पर रोका, पर अभाव था तो साध्य का जिसके बिना शक्ति अर्थहीन ही रहती। अत: शक्ति ने मिट्टी के एक टुकड़े को अपने सतो गुण से जीवन दिया। मिट्टी का टुकड़ा सतो गुण से युक्त एक पुरुष के स्वरूप में था। उस शक्ति ने उस पुरुष को आदेश दिया कि तुम मुझसे मिलकर  सृष्टि  का सृज...