बर्बरीक: प्रथम भाग


                          बर्बरीक


              महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। कुछ समय तक पांडवों के मन में यह ग्लानि रही कि उन्होंने अपने ही परिवार के सदस्यों को युद्ध में मार दिया है। पर समय का पहिया इस वेग से चला कि कुछ ही समय में सभी पांडव इस बात को भूल गए।
             एक दिन सभी पांडव और भगवान श्रीकृष्ण आपस में वार्तालाप कर रहे थे। तभी भीमसेन ने कहा कि मैंने अकेले ही सभी कौरवों का सर्वनास कर दिया। भीमसेन की बात सुनकर अन्य सभी पाण्डव भी युद्ध में अपने द्वारा मारे गए महारथियों के नाम लेने लगे। श्रीकृष्ण शान्त चित्त होकर सबकी बातें सुन रहे थे। सभी पांडवों की बातों से अभिमान झलक रहा था। कोई भी अपने को कम नहीं बता रहा था औऱ यह बताने का प्रयास कर रहा था कि उसी की वजह से पूरा युद्ध जीता गया है। तभी एक हंसी की आवाज सुनाई दी जो बहुत ही कर्कस थी। साथ ही इन सभी बातों को सुनकर भगवान श्रीकृष्ण को भी हंसी आ गई। जैसे ही भगवान हंसे सभी पांडव चुप हो गए। अर्जुन ने भगवान से पूछा कि प्रभु क्या हुआ और ये हंसी किसकी है, तो भगवान ने कहा कोई बात नहीं बस ऐसे ही हंसी आ गई। अर्जुन जानते थे कि श्रीकृष्ण की हंसी में जरूर कोई न कोई रहस्य छुपा है, इसलिए अर्जुन जिद करने लगे कि प्रभु मुझे जानना ही है कि आखिर बात क्या है?  क्योंकि कहा जाता है कि कुलीन व्यक्ति अनावश्यक हंसता नहीं है। अर्जुन के न मानने पर श्रीकृष्ण ने कहा कि मेरे साथ चलो। भगवान आगे-आगे चल रहे थे और उनके पीछे सभी पांडव। श्रीकृष्ण एक विशाल वट वृक्ष के पास जाकर रुक गए। सभी ने देखा कि उस पेड़ के सिखर पर एक दैत्याकार व्यक्ति का सिर रखा है और वह जोर-जोर से हंस रहा है। सभी को अपने पास देखकर उस सिर ने श्रीकृष्ण को प्रणाम किया और साथ ही पांडवों की ओर देखते हुए कहा कि आप सभी पितामहों को मेरा सादर प्रणाम। पांडव चकित थे कि ये व्यक्ति कौन है जो उन्हें पितामह कह रहा है औऱ जोरों से हंस भी रहा है। अब सभी पांडवों का संशय और भी बड़ता जा रहा था। सभी में जिज्ञासा भी कि यह व्यक्ति है कौन? औऱ यह आखिर हंस क्यों रहा है।

            भीमसेन ने उस कटे हुए सिर से पूछा कि तुम कौन हो और इस प्रकार से हमारी बातों पर हंस क्यों रहे हो? भीमसेन की बात सुनकर उस सिर ने जवाब दिया कि मैं आपका प्रपौत्र हूं और मेरी हंसी का कारण भी आप सभी लोग ही हैं। मैं सुन रहा था जब आप सब यह कह रहे थे कि मैंने युद्ध में इतने लोगों को मारा औऱ इसी बात पर मुझे हंसी आ रही थी। इस बात पर भीम ने कहा कि इसमें गलत क्या है हमनें ही तो वध किया है सबका। भीम की बात सुनकर उस कटे हुए सिर ने कहा कि यह भ्रम है आप सभी का। किसी ने भी किसी को नहीं मारा है, मैं इस पेड़ के शिखर से सब कुछ स्पष्ट देख रहा था। भीम ने कहा कि तो फिर किसने वध किया है। वह सिर बोला कि एक विशालकाय काया जो काले रंग की थी, वह जिस दल की ओऱ जाती थी उस दल के ही लोग मर जाते थे। और वह काया कोई औऱ नहीं बल्कि काल यानी मृत्यु ही थी जो सबको मार रहा थी। हां इन सबके बीच में मुझे पितामह भीमसेन की आवाज जरूर सुनाई देती थी।
                 उस सिर की बात सुन कर सभी का सिर शर्म से झुक गया। सभी पांडवों को आभास हो गया कि वास्तव में उन्होंने किसी को नहीं मारा अपितु सभी काल के हाथों मारे गए हैं वे तो निमित्त मात्र थे।
लेकिन भीमसेन ने फिर से प्रश्न कर दिया कि तुम हमें बार-बार पितामह क्यों बोल रहे हो? तुम हो कौन? भीमसेन के पूछने पर वह सिर बोला कि............
     

                               ........................क्रमश:

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