सृष्टि का आरम्भ

                                   सृष्टि का आरम्भ


                    जगत नासवान है पर कुछ तत्व कभी नष्ट नहीं होते वे हैं, शक्ति और साध्य। शक्ति और साध्य के मिलने से ही सृष्टि का सृजन होता है।
                  जब पूरा ब्रह्माण्ड जल मग्न था तब उस जल में शक्ति विचरण कर रही थी। इस शक्ति का कोई स्वरूप नहीं था और न ही कोई लिंग। अनन्त काल के भ्रमण के बाद उस शक्ति को स्थाईत्व की आवश्यकता हुई, जिससे सृजन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके। उस शक्ति ने स्वयं को एक स्थान पर रोका, पर अभाव था तो साध्य का जिसके बिना शक्ति अर्थहीन ही रहती। अत: शक्ति ने मिट्टी के एक टुकड़े को अपने सतो गुण से जीवन दिया। मिट्टी का टुकड़ा सतो गुण से युक्त एक पुरुष के स्वरूप में था। उस शक्ति ने उस पुरुष को आदेश दिया कि तुम मुझसे मिलकर सृष्टि का सृजन करो। उस पुरुष ने उत्तर देते हुए कहा कि तुमने मुझे जीवन दिया है अत: आपसे मिलकर में सृष्टि का सृजन नहीं कर सकता हूं। इस बात से छुब्ध होकर शक्ति ने उसे पुन: निर्जीव कर दिया और स्वयं जल में  विचरण करने लगी।
               असंख्य काल तक विचरण के उपरान्त एक बार पुन: शक्ति ने एक स्थान पर स्वयं को रोका और अपने रजो गुण की शक्ति से एक मिट्टी के टुकड़े को पुरुष का स्वरूप दिया। जब शक्ति ने सृजन के लिए उस पुरुष से सहयोग मांगा तो रजो गुण से उत्पन्न पुरुष ने अपने पूर्व के पुरुष की भांति ही शक्ति की बात को अस्वीकार कर दिया। शक्ति ने इसे भी निर्जीव कर दिया और जल में विचरण करने लगी।
              अनतं कालीन विचरण के उपरांत अब शक्ति ने अपने तमों गुण से एक मिट्टी के टुकड़े को जीवित कर उसे पुरुष स्वरूप दिया। शक्ति ने इससे भी सृजन में सहयोग की बात की तो पुरुष ने कहा कि यदि मैं भी पूर्व के पुरुषों की भांति इस कार्य को करने से मना कर दूं तो क्या होगा? शक्ति ने दृढ़ता पूर्वक कहा कि तुम्हें भी निर्जीव कर दिया जाएगा। तमो गुण से उत्पन्न उस पुरुष नें शक्ति की बात स्वीकार करली, पर एक वचन के साथ कि उससे पूर्व के सभी पुरुषों जो सत और रज गुण से उत्पन्न हैं. उन्हें पुन: जीवित किया जाए। 
              शक्ति ने तमो गुण से उत्पन्न पुरुष की बात मानली और दोनों को सजीव कर दिया। शक्ति स्वयं दो भागों में विभाजित हो गई। प्रथम भाग उस तमों गुण से उत्पन्न पुरुष मैं समाहित हो गई। वह पुरुष पहले मिट्टी अर्थात शव था, अब शक्ति के समाहित होने से शव + शक्ति = शिव बन गया। 
              सतो गुण वाला पुरुष ब्रह्मा और रजो गुण वाला पुरुष विष्णु के रूप में सम्मुख आए। जो एक अंश शक्ति का शेष बचा था वह अब तीन भागों में विभाजित होकर ब्रह्मा, विष्णु और शिव के साथ में ब्रम्हाणी, लक्ष्मी और शक्ति के रूप नें स्थापित हुई।


Comments

Popular posts from this blog

बर्बरीक: प्रथम भाग

बर्बरीक: (दूसरा भाग) भीमसेन और हिडिम्बा का विवाह

बर्बरीक: (भाग तृतीय)