बर्बरीक: चतुर्थ भाग
बर्बरीक: चतुर्थ भाग (शीश दानी बर्बरीक )
महाभारत के युद्ध के आरम्भ के ठीक पहले बर्बरीक का जन्म हो चुका था। अपनी
माता के सानिध्य में बड़ रहा बर्बरीक श्रीकृष्ण का अनन्य भक्त बन गया था। एक दिन
बालक बर्बरीक ने अपनी माता से प्रश्न किया कि मोक्ष प्राप्ति कैसे होती है? अहिलावती ने
बर्बरीक को बताया कि मोक्ष प्रप्ति के लिए भगवान की अनन्य भक्ति करनी होती है।
बर्बरीक ने कहा कि कोई और रास्ता नहीं है, जिससे मोक्ष की प्राप्ति सहजता से की जा
सके। अहिलावती ने कहा कि यदि किसी का वध भगवान के हाथों से हो जाता है, तो वह मोक्ष
को प्राप्त कर लेता है। ये बात बालक बर्बरीक के दिल में घर कर गयी।
पिता घटोत्कच और माता अहिलावती की तरह ही वह भी कई मायाबी शक्तियों का
स्वामी बन गया था। बर्बरीक को कामाख्या देवी नें तीन तीर प्रदान किए थे, जिनसे वह
पूरे संसार को नष्ट करने का सामर्थ रखता था।
बालक बर्बरीक समय के साथ बड़ा होता जा रहा था।
जब महाभारत के युद्ध का समय निकट आ गया तब तक बर्बरीक किशोरावस्था में आ चुका था।
और उसने अपार शक्तियां प्राप्त कर ली थीं। जैसे ही महाभारत का युद्ध आरम्भ हुआ
बर्बरीक भी अपनी माता से अनुमति लेकर युद्ध में शामिल होने के लिए चल दिया।
श्रीकृष्ण बर्बरीक के सामर्थ को जानते थे। अत: वे बर्बरीक से मिलने के लिए ब्राह्मण के
वेश में चल दिए। बर्बरीक रास्ते में चला जा रहा था, तभी उसे एक ब्राह्मण ने रोका।
बर्बरीक ने रुककर ब्राह्मण को प्रणाम किया। ब्राह्मण ने प्रश्न किया कि आप कौन हैं, और कहां जा रहे हैं? बर्बरीक ने
ब्राह्मण को अपना परिचय दिया औऱ कहा कि मैं युद्ध में सम्मलित होने के लिए जा रहा
हूं, परन्तु आप कौन है? ब्राह्मण ने अपना परिचय देते हुए कहा कि मैं
पांडवों का पुरोहित हूं, लेकिन यह बताएं कि आप युद्ध किस दल की ओऱ से करेगें? बर्बरीक ने कहा कि मैं युद्ध उसी सेना की ओर से
करूंगा जो सेना कमजोर होगी और जिसके हारने की सम्भावना अधिक होगी। ब्राह्मण ने कहा
कि तुम्हें तो अपने पितामाह की ओर से युद्ध करना चाहिए। बर्बरीक ने कहा कि नहीं
मैं तो उसी सेना का साथ दूंगा जो हारने वाली होगी। ब्राह्मण ने कहा कि तुम अकेले
ही किसी भी सेना को कैसे हरा सकते हो? बर्बरीक ने कहा कि देखिए ये जो पेड़ दिख रहा है
उसके सभी पत्तों को आप सेना मान लीजिए, मैं अपनी एक तीर से सभी पत्तों में छेद
करके दिखाता हूं। बर्बरीक के तीर चलाने के पहले ही ब्राह्मण ने उस पेड़ का एक
पत्ता तोड़ कर अपने हाथों में झुपा लिय़ा। बर्बरीक ने तीर चलाया और अगले ही पल पेड़
के सभी पत्तों में छेद था। ब्राह्मण ने जब अपने हाथों मे छिपाए पत्ते को देखा तो
उसमें भी छेद था। अब ब्राह्मण रूपी श्रीकृष्ण जान चुके थे कि किसी को भी बर्बरीक
से बचा पाना मुश्किल है। ब्राह्मण चिंतित हो गए। लेकिन बर्बरीक आगे की ओर बड़ गया।
बर्बरीक को जाता देख ब्राह्मण ने कहा कि रूको, मैं तुम्हें युद्ध नहीं करने दूंगा।
यदि तुमने मेरी बात न मानी तो मैं तुम्हारा वध कर दूंगा। लेकिन बर्बरीक ने बात
नहीं मानी और आगे बड़ता गया। ब्राह्मण के रूप को छोड़कर श्रीकृष्ण अब अपने
वास्तविक स्वरूप में आ गए और अपने सुदर्शन से बर्बरीक का सिर काट दिया।
कटे हुए सिर ने श्रीकृष्ण को प्रणाम करते हुए
कहा कि प्रभु मैंने आपको पहले ही पहचान लिया था। मैं चाहता था कि आप क्रोधित हों
और मेरा उद्धार आपके हाथों से हो जाए। ये बात सुनकर श्रीकृष्ण प्रसंन हो गए।
श्रीकृष्ण ने कहा कि तुमने अपनी बुद्धिमत्ता से मुझे प्रसंन किया है, अत: तुम आज से शीश दानी बर्बरीक
के नाम से जाने जाओगे। अगर तुम्हारी कोई इच्छा हो तो मुझसे कह सकते हो। बर्बरीक के
कटे हुए शीश ने कहा कि प्रभु मैं इस युद्ध को देखना चाहता हूं। श्रीकृष्ण ने
बर्बरीक के सिर को कुरुक्षेत्र के पास ही एक पेड़ के शिखर पर स्थापित कर दिया।
यह वही सिर था, जो पांडवों की बातों को सुनकर
हंसा था। साथ ही पांडवों के अभिमान को तोड़ा था कि उन्होंने ही सभी का वध किया है।
महाभारत के युद्ध के समय बर्बरीक के समान कोई भी योद्धा नहीं था। बर्बरीक इतना
सामर्थवान था कि वह चाहता तो पूरे संसार को नष्ट कर सकता था। इसी बात की चिंता के
कारण ही श्रीकृष्ण को बर्बरीक का वध करना पड़ा था। पर वास्तव में जो महान कार्य
बर्बरीक ने अपना शीश दान करके किया वो वास्तव में अद्वितीय है।

पांडवो को जित मिले इसलिये शिषडं किया था
ReplyDeleteIs barbarik known as babosa ?
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