बर्बरीक: (दूसरा भाग) भीमसेन और हिडिम्बा का विवाह



               भीमसेन और हिडिम्बा का विवाह



         लाक्षागृह की घटना के बाद सभी पांडव माता कुन्ती के साथ कुछ समय के लिए अज्ञात जीवन व्यतीत कर रहे थे। एक दिन सभी पांडव और कुंती भ्रमण करते हुए एक वन में आ पहुंचे। रात्रि का समय आने पर सभी लोग उसी वन में सोने लगे। उस वन में एक हिडिम्ब नाम का राक्षस रहता था। उस राक्षस की एक बहन भी थी, जिसका नाम हिडिम्बा था। हिडिम्बा ने वन में आते समय सभी को देखा था। उसका मन भीमसेन के प्रति आकर्षित था, वह मन ही मन भीम को प्रेम भी करने लगी थी। लेकिन हिडिम्ब ने सभी पांडवों को कुंती के साथ ही खा जाने की योजना बनाई, क्योंकि हिडिम्ब नरभक्षी राक्षस था। यह बात हिडिम्बा ने अपने भाई से छुपकर भीमसेन को बता दी। जैसे ही हिडिम्ब ने रात्रि के समय सभी पर हमला बोला भीम ने उसे मार गिराया। साथ ही  हिडिम्बा के साथ विवाह भी कर लिया।

        मां कुंती ने हिडिम्बा को आदेश दिया कि तुम हमारे साथ तभी तक रह सकती हो जबतक तुम्हें कोई संतान न हो। क्योंकि हिडिम्बा राक्षसी थी औऱ उसे  पांडव अपने साथ हस्तिनापुर नहीं ले जा सकते थे। कुंती की बात को हिडिम्बा ने स्वीकार कर लिया। कुछ समय के बाद भीमसेन के संबंध से हिडिम्बा ने एक पुत्र को जन्म दिया। उस पुत्र के सिर पर बाल न होने के कारण उस पुत्र का नाम घटोत्कच रखा गया। कुंती औऱ सभी पांडव कुछ समय के बाद वापस हस्तिनापुर आ गए किंतु हिडिम्बा और घटोत्कच उसी वन में रहने लगे।

         घटोत्कच अपने पिता से भी अधिक शक्तिशाली था। हिडिम्बा जन्म से भले ही राक्षस रही हो परन्तु उसके मन में श्रीकृष्ण के प्रति अधिक आदर था। श्रीकृष्ण के आदेशानुसार ही वह सभी कार्य भी करती थी। हिडिम्बा ने घटोत्कच का पालन भी बहुत उचित तरीके से किया ताकि उसमें किसी भी तरह की आसुरी प्रवृत्तियां न आ जाएं। अपनी युवा अवस्था में आते ही घटोत्कच में अपार बल और शक्तियां आ चुकी थी। माता से उसने अनेक मायावी शक्तियों की शिक्षा ली थी। और पिता कि तरह ही वह बलशाली था।

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