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Showing posts from May, 2018

राम एक आदर्श के रूप में...

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  राम एक आदर्श के रूप में... हम सभी राम को भगवान के रूप में स्वीकार करते हैं। एक भगवान का मर्यादा में रहना कोई बड़ी बात नहीं होती है, परन्तु राम एक मनुष्य के रूप में इस पृथ्वी पर आए और सदैव ही एक मनुष्य की तरह ही सुख-दुख का निर्वहन किया। राम ने कभी स्वयं को भगवान नहीं कहा और कोई भी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जिससे हम उन्हें भगवान के रूप में स्थापित करें। राम का जीवन आदर्श जीवन था और इसी आदर्श के कारण उन्हें भगवान का दर्जा दिया गया। वैसे भी हमारे देश की बात ही निराली है, हम किसी अच्छे व्यक्ति की नहीं मानते बल्कि उस व्यक्ति को मानने लगते हैं। राम ने अपने संपूर्ण जीवन में एक नहीं हजारों मर्याएं प्रस्तुत की जो उन्हें भगवान की श्रेणी तक ले जाती हैं। आदर्श भाई- राम जैसा भाई शायद ही कोई और देखने को मिले। अपने छोटे भाईयों के प्रति प्रेम के कारण ही उनके सभी भाई अपने माता-पिता के समान ही राम का सम्मान करते थे।   भरत के लिए राज सुखों का त्याग हो या लक्ष्मण को शक्ति लगने पर उनकी व्याकुलता और सबसे छोटे भाई शत्रुध्न के प्रति अपार प्रेम और विश्वास की संसार का सबसे घातक अस्त्र भ...

दुर्योधन वध

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                              दुर्योधन वध दुर्योधन का अन्त अभिमान और स्वार्थ का अंत था। व्यक्ति सबकुछ पाने की चाह में किस हद तक गिरकर अपने ही परिवार को छलने लगता है और महत्वाकांक्षा की वेदी पर अपनी और अपनों की भी बली चढ़ा देता है, यह सीख दुर्योधन के जीवन से लेनी चाहिए।                  व्यास जी के आशीर्वाद से गांधारी को एक सौ पुत्रों की प्राप्ति हुई। बड़े पुत्र का नाम सुयोधन रखा गया। सुयोधन वीर योद्धा था परन्तु गुणों की तुलना में दुर्गुण असंख्य थे। इन दुर्गुणों का बीजारोपण वास्तव में उसके पिता ने किया था। धृतराष्ट कि कुंठा और अंधी महत्वाकांक्षा ने सुयोधन के दुर्योधन होने तक की यात्रा में अपना पूर्ण योगदान दिया। बाल्यावस्था में ही दुर्योधन की कुटिलता दिखने लगी थी, जिसके कारण वह अपने ही भाई भीमसेन को जहर खिला देता है।  अपने अवगुणों को न देखकर अपनों की ख्याति से जलना तो दुर्योधन ने अपने ही पिता से सीखा था। पिता भी पुत्र मोह में इतना अंधा हो चुका था कि ...