दुर्योधन वध


                              दुर्योधन वध




दुर्योधन का अन्त अभिमान और स्वार्थ का अंत था। व्यक्ति सबकुछ पाने की चाह में किस हद तक गिरकर अपने ही परिवार को छलने लगता है और महत्वाकांक्षा की वेदी पर अपनी और अपनों की भी बली चढ़ा देता है, यह सीख दुर्योधन के जीवन से लेनी चाहिए।



                 व्यास जी के आशीर्वाद से गांधारी को एक सौ पुत्रों की प्राप्ति हुई। बड़े पुत्र का नाम सुयोधन रखा गया। सुयोधन वीर योद्धा था परन्तु गुणों की तुलना में दुर्गुण असंख्य थे। इन दुर्गुणों का बीजारोपण वास्तव में उसके पिता ने किया था। धृतराष्ट कि कुंठा और अंधी महत्वाकांक्षा ने सुयोधन के दुर्योधन होने तक की यात्रा में अपना पूर्ण योगदान दिया। बाल्यावस्था में ही दुर्योधन की कुटिलता दिखने लगी थी, जिसके कारण वह अपने ही भाई भीमसेन को जहर खिला देता है।  अपने अवगुणों को न देखकर अपनों की ख्याति से जलना तो दुर्योधन ने अपने ही पिता से सीखा था। पिता भी पुत्र मोह में इतना अंधा हो चुका था कि स्वयं अंधे होने की ग्लानि नहीं वरन् पुत्र की धूर्थता पर गौरवांवित होने लगा था।



         युवा दुर्योधन तो अपने चचेरे भाईयों को देखना भी पसंद नहीं करता था। लाक्षागृह की आग या फिर भाईयों का वन गमन इन सभी घटनाओं ने कभी भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और स्वयं राजा को चिंतित किया ही नहीं और किया भी तो इतना कि कभी दिखा ही नहीं। जिसने अपने ही परिवार की स्त्री को निर्वस्त्र करने जैसा कुकृत्य किया जो महाभारत के संग्राम में परिणित हुआ। भीमसेन ने भरी सभा में दुर्योधन के वध की प्रतिज्ञा की। द्रोपदी की प्रतिज्ञा थी कि दुर्योधन की जंघा के रक्त से ही वह अपने बालों को धुलेगी। महाभारत के युद्ध के अन्त का समय पास आ गया था। लगभग सभी योद्धा वीरगति को प्राप्त हो चुके थे, लेकिन दुर्योधन अपने प्राणों को बचाने के लिए जल के अन्दर छिप गया। द्वापर युग में भी वरदान प्राप्त करना कोई जटिल कार्य नहीं था, इसीलिए दुर्योधन ने भी बहुत से वरदान प्राप्त कर रखे थे, जिनके प्रभाव से वह स्वयं को जीवित रखना चाहता था। श्रीकृष्ण की चालाकी से दुर्योंधन स्वयं को छिपा न सका। अंत में दुर्योधन को युद्ध करने के लिए विवश होना ही पड़ा। गदा युद्धों के नियमों पर लड़ते हुए दुर्योधन को जीत पाना असंभव था। अत: श्रीकृष्ण ने भीमसेन को उनकी प्रतिज्ञा याद दिलाई। भीमसेन ने दुर्योधन की जंघा पर प्रहार किया जिससे जंघा टूट गई। असहनीय पीढ़ा के बावजूद भी दुर्योधन की मृत्यु नहीं रही थी क्योंकि उसे वरदान प्राप्त था कि अपार प्रसंनता और अपार दु:ख एक साथ आने पर ही उसकी मृत्यु हो सकती है। जो कि इतना सहज भी नहीं था। व्यास जी की दिव्यदृष्टि भी दुर्योधन की सांसों पर ही टिकी थी। जिससे धृतराष्ट को अपने पुत्र के अपार दर्द का वर्णन सीधे संजय के द्वारा सुनने को मिल रहा था।



                दुर्योधन और भीमसेन के युद्ध के ठीक बाद बलराम का आगमन होता है। बलराम दुर्योधन के कपट को कभी समझ नहीं सके थे। इसी कारण वश वे भीमसेन को मारने के लिए चल देते हैं। श्रीकृष्ण के समझाने पर उन्हें अपनी गलती का भान होता है। बलराम सिर्फ एक ही प्रश्न करते हैं कि दुर्योधन को हराने के लिए इतने कपट करने की क्या आवश्यकता थी। जिसके जवाब में श्रीकृष्ण ने बड़ी ही अच्छी बात कही थी कि जहर को जहर से मारना और कांटे को कांटे से निकालना कोई कपट नहीं है। ‘शठे शाठ्यं समाचरेत्’ यह भी तो एक सिद्धांत ही है और महाभारत के युद्ध में इसी नियम का पालन किया गया।

                    मृत्यु के कामना कर रहा दुर्योधन  अश्वत्थामा को पांडवों के वध का आदेश दे रहा है। इस बात से अधिक शर्म की बात क्या होगी कि एक व्यक्ति  जो मृत्यु की गोद में बैठा है अपनों को अभी भी नष्ट करना चाहता है। अश्वत्थामा गलती से पांडवों के स्थान पर उनके पांचों  पुत्रों के सिर दुर्योधन को सौंप देता है। दुर्योधन की प्रसंनता की कोई सीमा नहीं होती है पर जैसे ही उसे ज्ञात होता है कि ये सभी सिर तो पांडव पुत्रों के हैं न कि पांडवों के तो उसको अपार दु:ख होता है। सुख और दुख दोनों ही एक साथ दुर्योधन के सम्मुख थे और दुर्योंधन की मृत्य हो गई।   संजय की दिव्यदृष्टि भी समाप्त हो जाती है।

                  युद्ध के उपरान्त धृतराष्ट्र सभी पांडवों को अपने पास बुलाते हैं। विशेषकर भीमसेन को अपने गले लगाने की बात करते हैं। पर श्रीकृष्ण भीमसेन को धृतराष्ट्र के पास न भेजकर एक खंभें से धृतराष्ट्र की भेंट कराते हैं। धृतराष्ट्र उसे अपनी बांहों में इतने बल से दबाते हैं कि खंभा टूट कर चकना चूर हो जाता है। भीमसेन ने ही सभी एक सौ कौरवों को अकेले मारा था,  जिसका बदला धृतराष्ट्र लेना चाहता था। लेकिन विचार करने वाली बात यह है कि धृतराष्ट्र यदि गुणवान और न्यायप्रिय राजा होते तो कभी भी सुयोधन दुर्योधन न बन पाता और महाभारत जैसा महासंग्राम भी न होता। एक अंधा पिता अपनी महत्वकांक्षाओं को अपने पुत्र के माध्यम से पूरा करना चाहता है , इसके लिए वह सारे नियम कानून तोड़ देता है। राजधर्म का पालन नहीं करता, जिसका परिणाम आप सभी को पता है।


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