राम एक आदर्श के रूप में...
राम एक आदर्श के रूप में...
हम सभी राम को
भगवान के रूप में स्वीकार करते हैं। एक भगवान का मर्यादा में रहना कोई बड़ी बात
नहीं होती है, परन्तु राम एक मनुष्य के रूप में इस पृथ्वी पर आए और सदैव ही एक
मनुष्य की तरह ही सुख-दुख का निर्वहन किया। राम ने कभी स्वयं को भगवान नहीं कहा और
कोई भी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जिससे हम उन्हें भगवान के रूप में स्थापित करें।
राम का जीवन आदर्श जीवन था और इसी आदर्श के कारण उन्हें भगवान का दर्जा दिया गया।
वैसे भी हमारे देश की बात ही निराली है, हम किसी अच्छे व्यक्ति की नहीं मानते
बल्कि उस व्यक्ति को मानने लगते हैं।
राम ने अपने
संपूर्ण जीवन में एक नहीं हजारों मर्याएं प्रस्तुत की जो उन्हें भगवान की श्रेणी
तक ले जाती हैं।
आदर्श
भाई- राम जैसा भाई शायद ही कोई और देखने को मिले। अपने छोटे भाईयों के
प्रति प्रेम के कारण ही उनके सभी भाई अपने माता-पिता के समान ही राम का सम्मान
करते थे। भरत के लिए राज सुखों का त्याग
हो या लक्ष्मण को शक्ति लगने पर उनकी व्याकुलता और सबसे छोटे भाई शत्रुध्न के
प्रति अपार प्रेम और विश्वास की संसार का सबसे घातक अस्त्र भी उन्हें दे देते हैं।
ये सभी बातें तो महज एक उदाहरण ही हैं जो राम के भाईयों के प्रति प्रेम को
प्रदर्शित करती हैं। वन से वापस आने के बाद जब राम अपने हाथों से भरत की जटाओं को
सरयू के जल से धुल कर खोल रहे होते हैं उस मार्मिक वर्णन के यदि कोई कठोर ह़ृदय का
व्यक्ति भी पढ़े या सुने तो उसकी आंखों में भी अंश्रु आ जाएं।
आदर्श
पुत्र- पिता के सम्मान की रक्षा के लिए वन गमन हो या फिर माता के वचन पूर्ति
हेतु राजसी सुखों का त्याग, यह सभी राम को
आदर्श पुत्र के रूप में स्थापित करते हैं। चौदह वर्षों के वनवास से वापस आने के
बाद भी राम कौशल्या से नहीं वरन् कैकेयी से पहले मिलने जाते हैं। किसी भी मलाल के बिना वह सब के प्रति वही प्रेम
रखते हैं जो एक पुत्र को रखना चाहिए। कैकेयी जब राम को बताती हैं कि भरत ने उन्हें
मां कहना बन्द कर दिया है तब राम भरत अपनी सपथ दे कर पुन: भरत
से मां कहने का आदेश तक दे देते हैं।
आदर्श
पति- जिस समय राजाओं की एक से अधिक पत्नियां हुआ करती थी, उस समय राम ने
सीता को एकपत्नी व्रत रखने का वचन दिया। सीता का त्याग वास्तव में धर्म है तो राम
का सीता के प्रति प्रेम आदर्श और मर्यादा की पराकाष्ठा है। सीता हरण के बाद राम ने
सीता की तलाश में जितने कष्ट उठाए उनका वर्णन करना असंभव है। एक पति मर्यादा की
रक्षा के लिए अपनी पत्नी का त्याग करता है तो जो वियोग पत्नी को मिलता है वही
वियोग पति को भी प्राप्त होता है। राम का सीता के प्रति अपार प्रेम ही तो था कि राजा
होने के बावजूद राम ने कभी सीता को अपने दिल से दूर नहीं होने दिया। पुरुष कभी
अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं करते और यदि वह राजा हो तो उसको और भी बन्धन होते
हैं। इन्हीं बन्धनों के कारण राम ने सीता के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त नहीं
किया। पर सीता कि लिए जो किया उसे यहां व्यक्त करनी को आवश्यकता भी नहीं है।
आदर्श
राजा- भारत में आज भी लोग राम राज्य वापस आने की कल्पना करते हैं, क्योंकि
राम के राज्य में कोई दुखी नहीं था। राम अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से हटकर प्रजा
के लिए कार्य करते थे। एक राजा के रूप में राम के लिए प्रजा पहले थी और उनका अपना
परिवार और सुख-दुख बाद में, इसी कारणवश राम ने सीता का त्याग भी किया था। क्योंकि
राम के लिए राजधर्म पहले था, अपना परिवार बाद में। राम ने जो आदर्श एक राजा के रूप
में स्थापित किया वह अद्वितीय था। जिसके कारण आज भी हम अपने समाज और देश में
रामराज्य की कल्पना करते हैं।

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