लीलाधर’ भगवान श्रीकृष्ण


लीलाधर’ भगवान श्रीकृष्ण

            श्रीकृष्ण को कुछ लोग भगवान, तो कुछ लोग महामानव के रूप में स्वीकार करते हैं। सनातन धर्म  को मानने वालों ने श्रीकृष्ण को भगवान के रूप में अपनाया है तो अन्य लोगों ने उन्हें महामानव की संज्ञा दी है। श्रीकृष्ण ने हमें मानवीय मूल्यों से परिचित कराने के लिए एक ऐसा ग्रंथ दिया, जो वास्तव में अद्वितीय है। श्रीमद्भभगवतगीता को मानवतावादी पुस्तक का दर्जा प्राप्त है, क्योंकि इस देववाणी में मानव के मस्तिष्क में आने वाले हर एक प्रश्न  का उत्तर मिल जाता है।

           व्यक्ति उपदेशों से नहीं अपितु अपने कर्मों से महान बनता है। यदि हम श्रीकृष्ण को एक मानव के रूप में देखें तो उनमें ईश्वरीय गुण अवश्य देखने को मिल जाएगें। श्रीकृष्ण को परिभाषित करने या फिर उन्हें जगत के अन्य मनुष्यों से सर्वश्रेष्ठ दर्शाने वाले गुण-

महायोगी- श्रीकृष्ण महायोगी थे। महायोगी का अर्थ उस व्यक्ति से होता है, जिसने काम को जीता हो। लोगों को संदेह रहता है कि हजारों पत्नियों के रहते वे महायोगी कैसे हो सकते हैं? ‘काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ ये सब मानवीय गुण है’ और इनसे जो व्यक्ति परेय हो जाता है वही ईश्वरत्व को प्राप्त करता है, और जो स्वयं ईश्वर हो उसमें ये गुण कैसे आ सकते हैं।

कर्मयोगी- श्रीकृष्ण ने कर्मों को ही प्रधान माना है, इसी कारण गीता में सिर्फ और सिर्फ मनुष्य को कर्म के प्रति जागरुक किया है। श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि कर्मों का प्रतिफल ही भाग्य होता है। ये बातें कही ही नहीं अपितु श्रीकृष्ण ने करके भी दिखाई हैं। परिस्थिति के आधार पर मानव को अपने दायित्वों का निर्वहन किस तरह से करना चाहिए, ये बात श्रीकृष्ण के जीवन से स्पष्ट हो जाती है।

छलिया- श्रीकृष्ण को गोपिकाएं छलिया कहकर बुलाती थी और वास्तव में वे छलिया थे। छलिया का सीधा सा अर्थ है, जैसे को तैसा। श्रीकृष्ण ने व्यक्ति के स्वभाव के आधार पर उससे वर्ताव किया है। सत्य के रक्षा के लिए उन्होंने ‘साम, दाम, दंड, भेद’ सभी का उपयोग किया है, और करना भी चाहिए क्योंकि “खग जाने खग ही की भाषा”   की स्थिति सदैव उत्पन्न होती रहती है।

रणछोंड़- आवश्यकता के आधार पर निर्णय लेना ही बुद्धिमत्ता है, इस बात को श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है। कालनेमि से लड़ते समय रण-प्रांगड़ छोड़कर भागना श्रीकृष्ण की मजबूरी नहीं बुद्धिमत्ता का उदाहरण था, जो हमें सिखाता है कि व्यक्ति को समय का स्वभाव जानना चाहिए, फिर निर्णय उसी के आधार पर निर्णय लेने चाहिए।

भक्त वत्सल- भीष्म की प्रतिज्ञा के लिए अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ना श्रीकृष्ण के अलावा कौन कर सकता है? अपनों की रक्षा के लिए सांसारिक नियमों को तोड़ कर अर्जुन को पुन: जीवित करना हो या फिर सुदामा का भाग्य बदलकर दीनता को मिटाना, ये सभी श्रीकृष्ण को महानता की पराकाष्ठा तक ले जाते हैं।

वचन वद्धता- गुरु संदीपनी को वचन देकर उनके पुत्र को यमराज से वापस लाना, द्रोपदी को दिए वचन को निभाते हुए एक साड़ी के टुकड़े के बदले अनंत साड़ियां देकर लाज बचाना, श्रीकृष्ण के सिवा कौन कर सकता है? गांधारी को दिए एक वचन के कारण अपने सम्पूर्ण कुल को स्वयं नष्ट करने का सामर्थ्य श्रीकृष्ण के अतिरिक्त किसी में नहीं हो सकता है।
सनातन धर्म के ग्रंथों के आधार पर श्रीकृष्ण संपूर्ण 16 कलाओं से युक्त थे, जिनका प्रदर्शन उन्होंने उचित स्थान पर किया और सत्य को स्थापित किया।

Comments

  1. तत्व ज्ञानरूपी शब्द समूह से जो आपने एक महान दार्शनिक के दर्शन कराने का जो प्रयास किया वो अदभुत है

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